भोपाल।  एलएनसीटी यूनिवर्सिटी में बी.फार्म द्वितीय सेमेस्टर के विद्यार्थियों के लिए “एंटीएपिलेप्टिक दवाओं का अवलोकन” विषय पर एक विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह व्याख्यान डॉ. प्रदीप कुमार मोहंती, फैकल्टी, स्कूल ऑफ फार्मेसी द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. ए. के. सिंघई, निदेशक, स्कूल ऑफ फार्मेसी एवं डीन एकेडमिक्स द्वारा स्वागत भाषण के साथ हुआ। अपने संबोधन में उन्होंने मिर्गी (एपिलेप्सी) के प्रभावी प्रबंधन में एंटीएपिलेप्टिक दवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। व्याख्यान के दौरान डॉ. मोहंती ने मिर्गी का विस्तृत परिचय देते हुए बताया कि यह एक दीर्घकालिक न्यूरोलॉजिकल विकार है, जिसमें मस्तिष्क में अचानक, अत्यधिक और असामान्य विद्युत गतिविधि के कारण बार-बार दौरे (सीज़र्स) आते हैं। उन्होंने समझाया कि यह स्थिति उत्तेजक न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे ग्लूटामेट) और अवरोधक न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे GABA) के बीच असंतुलन के कारण उत्पन्न होती है। मिर्गी के वर्गीकरण को भी विस्तार से समझाया गया, जिसमें फोकल (आंशिक) और जनरलाइज़्ड सीज़र्स शामिल हैं। जनरलाइज़्ड सीज़र्स के प्रकार—टॉनिक-क्लॉनिक, एब्सेंस, मायोक्लॉनिक और एटोनिक—पर विशेष रूप से चर्चा की गई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सामान्यतः उपयोग की जाने वाली एंटीएपिलेप्टिक दवाओं जैसे फेनिटोइन, कार्बामाज़ेपिन, सोडियम वैल्प्रोएट, एथोसक्सिमाइड और लेवेटिरासेटम की कार्यविधि (मेकैनिज़्म ऑफ एक्शन) पर प्रकाश डाला। साथ ही महत्वपूर्ण निषेध (कॉन्ट्राइंडिकेशन्स) भी बताए, जैसे—गर्भावस्था और यकृत रोग में वैल्प्रोएट का प्रयोग न करना, बोन मैरो डिप्रेशन में कार्बामाज़ेपिन से बचना तथा गंभीर श्वसन अवसाद की स्थिति में बेंजोडायजेपाइन्स का उपयोग न करना।